सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

ऐसे बनेगा भारत भ्रष्टाचार मुक्त...!!

एक मशहूर हिंदी फिल्म का गाना है-जिसने पाप न किया हो, जो पापी न हो..”, यदि इसे हम अपने देश में भ्रष्टाचार के सन्दर्भ में मामूली फेरबदल के साथ कुछ इसतरह से लिखे -जिसने भ्रष्टाचार न किया हो,जो भ्रष्ट न हो..”, तो कोई अतिसयोंक्ति नहीं होगी क्योंकि हम सब भ्रष्ट है और हम में से कोई भी ऐसा नहीं होगा जो कभी भ्रष्टाचार में लिप्त न रहा हो. मेरी इस बात पर कई लोगों को आपत्ति हो सकती है और होनी भी चाहिए लेकिन यदि वे भ्रष्टाचार की सही-सही परिभाषा को समझ ले तो वे भी न केवल मेरी बात से सहमत हो जाएंगे बल्कि समाज को बदलने से पहले स्वयं को बदलने में जुट जाएंगे.


 दरअसल भ्रष्टाचार का मतलब अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए किसी व्यक्ति द्वारा अधिकारों का दुरूपयोग करना या वित्तीय लाभ लेना भर नहीं है बल्कि नैतिक रूप से जो भी गलत है वह भ्रष्टाचार के दायरे में आएगा. मसलन आप से मिलने घर आए किसी व्यक्ति से मिलने से बचने के लिए पत्नी/बच्चे से यह कहलवाना कि आप घर में नहीं है, भी उसीतरह का भ्रष्टाचार है, जैसे दूध में पानी मिलाना या मिर्च-धने में व्यापारी द्वारा मिलावट करना. बिजली चोरी करना भी भ्रष्टाचार है तो आफिस के सरकारी फोन से व्यक्तिगत काल करना भी. स्कूल में बच्चे को प्रवेश दिलाने के लिए डोनेशन देना/लेना भ्रष्टाचार है तो आयकर बचाने के लिए फर्जीवाड़ा करना भी. सरकारी कर्मचारी का रिश्वत लेना/देना भ्रष्टाचार है तो फर्जी बिल बनाकर कम बिक्री दिखाना भी. हम में से शायद ही कोई होगा जिसने मैं घर में नहीं हूँजैसा भ्रष्टाचार नहीं किया होगा. यह तो इसलिए भी ज्यादा गंभीर अपराध है क्योंकि इस भ्रष्टाचार में पत्नी/बच्चों को शामिल कर हम-आप नई पीढ़ी को भी इस कला में महारत बना देते हैं और फिर बोया बीज बबूल का, तो आम कहाँ से होएं’.
 यह देश का दुर्भाग्य है कि हमने सरकारी विभागों में काम के लिए पैसे के लेनदेन को ही भ्रष्टाचार मानकर इतिश्री कर ली है. किसान का आर्गनिक के नाम पर रासायनिक खाद मिलाकर पैदा की गयी फसल बेचना भी भ्रष्टाचार है तो कार्यालय समय पर नहीं आना भी. इसीतरह कार्यालयीन समय में काम की बजाए गप्प मारना/चाय-पान के नाम पर समय बर्बाद करना भी भष्टाचार है. हाँ यह हो सकता है कि इन कामों में भ्रष्टाचार की मात्रा कम-ज्यादा हो या इनका प्रभाव सीधे तौर पर न दिखता हो लेकिन हम तेरी कमीज से ज्यादा सफ़ेद मेरी कमीजकी तर्ज पर यह कहकर बच तो नहीं सकते न कि मैं आपसे या आप मुझसे कम भ्रष्ट हैं.
कल्पना कीजिए यदि हम सभी इन छोटी-छोटी बातों या छोटे-छोटे भ्रष्टाचार को त्याग दें अर्थात् समय पर कार्यालय पहुंचें,निर्धारित अवधि में पूरा काम करें, स्कूल में बच्चे के शिक्षक या स्कूल प्रबंधन को खुश करने के लिए डोनेशन न दे,काम वाली बाई को इंसान समझकर उसके अधिकारों का सम्मान करें, दूकानदार को सही बिल देने के लिए मजबूर करें,कर बचाने के लिए सीए के चक्कर काटने से ज्यादा निर्धारित कर देने में रूचि लेने जैसी बातों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें तो न केवल हम देश के प्रति अपने कर्तव्य जिम्मेदारी से निभा सकेंगे बल्कि अपने से जुड़े लोगों को भी प्रेरित कर सकेंगे और यहीं से होगी भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण की शुरुआत.
ईमानदारी और नैतिकता बिलकुल उसीतरह से छूत की बीमारियाँ हैं जैसे भ्रष्टाचार,यदि एक बार हम-आप ने इन्हें अपना लिया तो फिर इन्हें फैलने से कोई नहीं रोक सकता. इसका फायदा यह होगा कि जब सभी अपने अपने हिस्से का काम सही ढंग,ईमानदारी और नैतिकता को ध्यान में रखते हुए समय पर करेंगे तो न सड़कें ख़राब होंगी और न ही उनकी बार-बार मरम्मत होगी,बिजली-पानी घर घर में होगा, परिवेश साफ़-सुथरा होगा तो बीमारियाँ भी कम हो जाएँगी और अस्पतालों में डाक्टर और दवाइयां दोनों की उपलब्धता अपने आप बढ़ जाएगी. किसान ऋण चुकाने से लेकर उर्वरक के इस्तेमाल में ईमानदारी बरतेगा तो बैंक भी ऋण देने में पीछे नहीं रहेंगे,व्यापारी समय पर ईमानदारी से कर (अब जीएसटी) देगा तो विकास को रफ़्तार मिलेगी और तभी होगी भ्रष्टाचार मुक्त भारत की स्थापना.
अभी क्या स्थिति है किसी से भी छिपी नहीं है.   देश की कुल आबादी में करदाताओं की संख्या सिर्फ एक प्रतिशत हैं। मात्र, 5,430 लोग ही ऐसे हैं जो सालाना एक करोड़ रुपये से अधिक का टैक्स देते हैं। कुल मिलाकर 2.87 करोड़ लोग आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं। इनमें से 1.62 करोड़ ने कोई टैक्स नहीं देते। इस तरह करदाताओं की कुल संख्या 1.25 करोड़ रही, जो देश की सवा करोड़ की आबादी का महज एक प्रतिशत है।  इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि देश में कर चोरों की तादाद कितनी बड़ी होगी. देश के केवल वेतन भोगी ही मजबूरी में सबसे ईमानदारी से आयकर देते हैं. लेकिन छोटे कारोबारी, प्रोफेशनल वकील, डॉक्टर, सीए, कोचिंग, शिक्षक आयकर विभाग को चकमा देने में कामयाब हो जाते हैं. भारत में कृषि आय पर कोई कर नहीं लगता है. यह आयकर चुराने का सबसे बड़ा जुगाड़ है. क्या आपने कभी किसी हलवाई, पानवाले या पंसारी को आयकर देते सुना है जो हर मोहल्ले में फैले हुए हैं. इन सभी को कर की मुख्य धारा में लाये बिना भारत भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो सकता.
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय  राजीव गाँधी ने तो बेहिचक कहा था विकास व जन कल्याण के लिए केंद्र सरकार द्वारा भेजे गये 100 रुपए में मात्र 15 रुपये ही जनता तक पहुंचते हैं शेष 85 रुपये बीच का भ्रष्ट तंत्र हजम कर लेता है। शायद यही कारण है कि सत्ता में आने के बाद ही प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को यह कहना पड़ा था कि वंचितों, गरीबों और किसानों को उनके अधिकार दिये जा सकते हैं, युवाओं को आत्मनिर्भर और महिलाओं को सशक्त बनाया जा सकता है, लेकिन इसके लिए भ्रष्टाचार से निपटना होगा.छठे  ग्लोबल फोकल प्वाइंट कॉन्फ्रेंस ऑन एसेट रिकवरीका उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार से कड़ाई से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है और अफसरशाही को बेहतर बनाने का प्रयास कर रही है. सत्ता में आने से पहले उन्होंने  ईमानदार भारत के लिए मिनिमम गवर्नमेंट एंड मैक्सिमम गवर्नेंसका लोकप्रिय नारा भी दिया था और जन-धन खातों से लेकर सब्सिडी के डिजीटल ट्रांसफर जैसे कदम उठाए.
ऐसा भी नहीं है देश में भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए कानून नहीं है. हमारे देश में भारतीय दण्ड संहिता, 1860,भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम, अर्थशोधन निवारण अधिनियम, 2002 तथा आयकर अधिनियम 1961जैसे दर्जनों कानून है लेकिन कोई भी कानून तभी काम कर सकता है जब उसे लागू कराने वाले और उसके अंतर्गत आने वाले लोग ईमानदार हो.             
  ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल नामक संस्था द्वारा कुछ समय पहले किये गये एक अध्ययन में पाया गयाथा  कि 62% से अधिक भारतवासियों को सरकारी कार्यालयों में अपना काम करवाने के लिये रिश्वत या प्रभाव का इस्तेमाल करना पड़ता है. अब ये 62 फीसदी लोग कौन(!), हम आप ही तो हैं जो एक दफ्तर में में काम कराने के लिए रिश्वत देते हैं और दूसरे में काम करने के लिए लेते हैं. यह लेनदेन का सिलसिला सालों साल से बस यूँ ही चला आ रहा है. इस बात को कुछ इसतरह से भी समझा जा सकता है कि हम खुद व्यापारी होकर चंद रुपए बचाने के लिए ऑनलाइन खरीददारी करते हैं और फिर खुद अपनी दुकान पर ग्राहक न पाकर कहते हैं कि बाज़ार में मंदी है या सरकार की नीतियों ने कमर तोड़ दी. सीधी सी बात है यदि हर व्यक्ति आत्मकेंद्रित होकर सोचेगा तो फिर बाज़ार का पहिया कैसे घूमेगा. इसीतरह यदि हम खुद ईमानदार न होकर दूसरे से ईमानदार होने की अपेक्षा करेंगे तो फिर देश कैसे भ्रष्टाचार मुक्त होगा.
अपनी बात का समापन मैं एक छोटी परन्तु लोकप्रिय कहानी से करता हूँ. इस कहानी के मुताबिक एक राजा ने अपनी राजधानी में संगमरमर का खूबसूरत तालाब बनवाया. अब इतने सुन्दर तालाब को पानी से भरना तो शोभा नहीं देता इसलिए उसने सोचा कि तालाब को दूध से भर दिया जाए. एक साथ इतना दूध जुटाना नामुमकिन था तो उसने अपनी प्रजा से अनुरोध किया कि सभी रात को अपने अपने घर से एक एक गिलास दूध इस तालाब में डाले ताकि सुबह तक तालाब दूध से भर जाए.अब लाखों गिलास दूध तालाब में जायेगा तो उसे भरना ही था और प्रजा पर भी अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता. लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है एक व्यक्ति ने सोचा कि लाखों लोग तो दूध डालेंगे ही यदि मैं दूध की जगह चुपचाप एक गिलास पानी डाल दूँ तो किसी को पता भी नहीं चलेगा और मेरा दूध भी बच जायेगा. कुछ यही विचार दूसरे के मन में भी आए और जनता तो समान सोच रखती है बस इसका परिणाम यह हुआ कि वह तालाब सुबह दूध की बजाए पानी से भरा था क्योंकि सभी ने यही सोचा कि मेरे एक गिलास पानी से क्या फर्क पड़ेगा? तो सोचिये, देश को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के प्रयासों में क्या हम भी दूध के स्थान पर चुपचाप पानी तो नहीं डाल रहे हैं?....ऐसी स्थिति में सरकार डिजीटल लेनदेन,नोटबंदी, प्रतिदिन के लेनदेन को सीमित करने जैसे कितने भी कदम उठा ले,मौजूदा कानूनों को कड़ा कर दे और सीबीआई नुमा दर्जनों जांच एजेंसियां गठित कर दे, तब भी देश भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो सकता क्योंकि कोई भी देश/समाज कानूनों के सहारे ईमानदार नहीं बनाया जा सकता बल्कि उसे नैतिक रूप से मजबूत बनाना होगा तभी भारत भ्रष्टाचार मुक्त हो सकता है इसलिए जब भी हमारी-आपकी बारी आए तो हमें कम से कम अपने हिस्से की नैतिकता दिखानी चाहिए और पानी नहीं दूध ही डालना होगा तभी बनेगा भारत भ्रष्टाचार मुक्त!!
#corruption #india

गरीब-अनपढ़ पेंगू ने मारा हिन्दू-मुस्लिम में बांटने वालों को तमाचा !!

आज के समय में जब खून के रिश्तों का मोल नहीं है,परिवार टूट रहे हैं , लोग अपनों तो दूर मां-बाप की भी जिम्मेदारी उठाने से बच रहे हैं और जाति-धर्म की दीवारें समाज को निरंतर बाँट रहीं हैं, ऐसे में किसी दूसरे धर्म के तीन अनाथ बच्चों को सहारा देना वाकई काबिले तारीफ़ है और वह भी तब इन तीन बच्चों में से दो विकलांग हों...लेकिन कहते हैं न कि यदि कुछ करने की चाह हो तो इंसानियत सबसे बड़ा धर्म बन जाती है और फिर यही भावना मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाने की ताकत देती है. कुछ ऐसा ही हाल पेंगू अहमद बड़भुइयां का है. मणिपुरी मूल के मुस्लिम पेंगू अहमद सिलचर फुटबाल अकादमी में चौकीदार हैं और अपनी सीमित आय में सिलचर से दूर गाँव में रह रहे अपने मूल परिवार में चार बच्चों का किसीतरह भरण पोषण करते हैं लेकिन इसके बाद भी इन अनाथ-बेसहारा बच्चों को अपनाने में उन्होंने जरा भी हिचक नहीं दिखाई.
पेंगू के मानवता परिवार में सबसे पहले विष्णु शामिल हुआ. विष्णु के पैर जन्म से ख़राब हैं और जब वह छोटा ही था तभी मां चल बसी. इसके बाद विष्णु के पिता ने दूसरी शादी कर ली और जैसा कि आमतौर पर होता है कि सौतेली मां ने विकलांग बच्चे को नहीं अपनाया और घर से निकाल दिया. असहाय पेंगू सिलचर रेलवे स्टेशन पर भीख मानकर गुजर बसर करने लगा लेकिन एक बार किसी वीआईपी के दौरे के समय रेलवे पुलिस ने उसे स्टेशन से भी बाहर निकाल दिया. विष्णु ने फिर एक पेड़ के नीचे शरण ली. एक दिन भारी बारिश में भीगते और ठण्ड से थर थर कांपते विष्णु पर पेंगू की नज़र पड़ी तो वो उसे अपने साथ ले आया. अब दोनों का साथ 7 साल का हो गया है.
दूसरा बच्चा लक्खी(लक्ष्मी) प्रसाद के पैर एक आग दुर्घटना में इतनी बुरीतरह जल गए कि उसके घुटने ही नहीं है इसलिए हाथों के सहारे चलता है. लक्खी के पिता के निधन के बाद मां ने दूसरी शादी कर ली और नए पिता ने विकलांग लक्खी को बोझ समझकर अपने घर से निकाल दिया. वह सड़क पर,दुकानों के बरामदों या फुटपाथ पर रात गुजारता था. सैंकड़ों लोग रोज देखते थे लेकिन किसी ने भी सहारा नहीं दिया परन्तु पेंगू की स्नेहमयी दृष्टि पड़ गयी और वह भी उसके साथ रहने के लिए फ़ुटबाल अकादमी के एक कमरे के घर में आ गया. तीसरा बच्चा प्रदीप अपने आप आ गया.वह अनाथ था और विष्णु-लक्खी से उसे पेंगू अहमद के बारे में पता चला तो पितृतुल्य पेंगू ने उसे भी अपना लिया. सबसे अच्छी बात यह हुई कि फ़ुटबाल अकादमी के पदाधिकारियों ने भी इन अनाथ विकलांग बच्चों को अपने परिसर में रखने पर आपत्ति नहीं की और पेंगू का यह परिवार भी समय के साथ पटरी पर आ गया. लगभग ५५ साल के पेंगू को सारे बच्चे प्यार से दादू कहते हैं
पेंगू ने अपने संपर्कों की मदद से दोनों विकलांग बच्चों को  मुफ्त में ट्राई साइकिल दिलवा दी जिससे उनका चलना-फिरना आसान हो गया. इतने साल से पेंगू ही मां-बाप बनकर इन बच्चों की देखभाल कर रहा है. उन्हें नहलाने धुलाने से लेकर उनका बिस्तर लगाना और खाना बनाने,बीमार पड़ने पर दवाई कराना जैसे तमाम काम पेंगू अपनी व्यस्त दिनचर्या के बाद भी माथे पर शिकन लाये बिना सालों से करता आ रहा है.अब प्रदीप को नौकरी पर रखवा दिया सिलिये जिम्मेदारियों का बोझ कुछ कम हुआ है . पेंगू का परिवार भी इन बच्चों से घुल मिल गया है और पेंगू जब भी अपने घर जाता है तो उसकी पत्नी इन बच्चों के लिए भी खाने-पीने का सामान भेजती है.वाकई आज के मतलबी और आत्मकेंद्रित समय में पेंगू अहमद बड़भुइयां किसी फ़रिश्ते से कम नहीं है और समाज के लिए अनुकरणीय भी.
#Hindu #muslim #silchar #Assam #Barakvalley #handicapped #children


गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

बकरी...जो बिना पंखे और पलंग के नहीं सोती !!

  चाहे मौसम कोई भी हो पर उसे पंखे के बिना नींद नहीं आती है और सोना पलंग पर ही पसंद है परन्तु अगर चादर में सलवटें पड़ी हो या बिस्तर ठीक नहीं हो तो वो पलंग पर सोना तो दूर चढ़ना भी पसंद नहीं करती। बच्चों को लेकर इसतरह के नखरे हम-आप घर घर में सुनते रहते हैं लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि हम यहाँ किसी बच्चे की नहीं, बल्कि एक बकरी की बात कर रहे हैं।
आमतौर पर कुत्ते-बिल्लियों को उनके और उनके मालिकों के अजीब-गरीब शौक के कारण जाना जाता है लेकिन सिलचर की एक बकरी के अपने अलग ही ठाठ हैं और अच्छी बात यह है कि उसकी मालकिन भी उसके शौक पूरे करने में पीछे नहीं रहती। इस बकरी का नाम ‘नशुबाला’ है और यह असम विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक दूर्बा देव की है। खुद दूर्बा बताती हैं कि बिस्तर पर चढ़ने के पहले नशुबाला सिर उठाकर सीलिंग फैन(पंखे) को देखना नहीं भूलती। यदि पंखा चल रहा है तो वो पलंग पर चढ़ जाएगी और यदि बंद है तो तब तक नीचे बैठी रहेगी जब तक कि पंखा चालू न कर दिया जाए। इसके अलावा, उसे बिस्तर भी साफ़-सुथरा चाहिए। यदि चादर अस्त-व्यस्त है तो उसे ठीक कराए बिना नशुबाला को चैन नहीं मिलता। मजे की बात यह है कि वह दूर्बा के साथ उन्हीं के पलंग पर सोती है और उसे मच्छरदानी के भीतर सोना पसंद नहीं है इसलिए दूर्बा रोज तीन तरफ से मच्छरदानी बंद करती हैं लेकिन एक तरफ से खुली छोड़ देती हैं ताकि उनकी बकरी नशुबाला आराम से सो सके ।
लगभग साढ़े तीन साल की यह बकरी उम्दा खानपान और देखभाल के कारण कद काठी में अपनी उम्र से बड़ी ही नज़र आती है लेकिन एक ही पलंग पर सोने के बाद भी आज तक उसने न तो कभी दूर्बा को पैर मारे और न ही कभी बिस्तर गन्दा किया। सोना ही नहीं,खाने-पीने में भी नशुबाला के अपने मिजाज़ हैं मसलन उसे खाने में ताज़ी हरी सब्जियां ही चाहिए और वह भी पूरे सम्मान के साथ । यदि घर के किसी सदस्य ने यूँ ही जमीन पर उसकी खुराक डाल दी तो वह उसे मुंह भी नहीं लगाती। इसीतरह सब्जियों के डंठल या घर के उपयोग के बाद बाहर फेंकने वाला हिस्सा भी उसकी खुराक में शामिल नहीं होना चाहिए बल्कि उसे ताज़ी और पूरी सब्जी चाहिए। हरे पत्तों में कटहल के पत्ते उसे सबसे प्रिय हैं।
एक और आश्चर्यजनक बात यह है कि नशुबाला ने आज तक किसी अन्य बकरी को नहीं देखा क्योंकि हास्पिटल रोड पर द्वितीय मंजिल पर रहने वाली दूर्बा उसे कभी भी नीचे नहीं उतारती और कभी नीचे ले जाने की जरुरत हुई तो भी उसे अपनी देखरेख में ही लाती-ले जाती हैं। दरअसल नशुबाला, उनके घर में तीसरी पीढ़ी की बकरी है । वे बताती हैं कि नशुबाला की मां की मां एक बरसाती रात में भटककर उनके घर आ गयी थी और फिर यहीं रह गयी लेकिन नशुबाला की मां को जन्म देने के महज चार माह बाद ही उसकी मृत्यु हो गयी। कुछ ऐसा ही किस्सा नशुबाला की मां के साथ भी हुआ और उसने भी नशुबाला को जन्म देने के चार माह बाद प्राण त्याग दिए इसलिए दूर्बा को डर है कि कहीं नशुबाला मां बनी तो वह भी चार माह बाद ही उनका साथ न छोड़ दे इसलिए उन्होंने इसे बकरियों से अब तक दूर ही रखा है। अब तो हाल यह है कि नशुबाला और दूर्बा एक दूसरे के ऐसे साथी की तरह हैं जो किसी भी सूरत में एक दूसरे से अलग नहीं होना चाहते ।
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